Wednesday, 23 May 2018

कज़ान

मैं उस आदमी को सत सत धन्यवाद देना चाहता हूं, जिसमे प्रेम का आविष्कार किया होगा।

ओह....मैं कितनी देर इस कुर्सी पर बैठा रहूं। कितनी देर खुद को कोसता रहूं। कितनी देर अपना चेहरा आईने में देखता रहूं। उस आदमी से बैर सा होने लगा है, जिसे आईना देखना बहुत पसंद था। क्या मैं यहा लिख दूं, कि मुझे तुम्हें एक बार देखने को मन कर रहा है ? क्या इतना भर कर देने से मैं चैन से सो पाऊंगा ?  या फिर मैं एक बार फिर से तुम्हारी आवाज सुन लूं...और तुम्हें एक बार बुड़बक कह दूं...तो मुझे नींद आ जाएगी ? एकांत के अरण्य में मैं कब तक भटकता रहूं। क्या बस खुद को कोस भर लेने से शांति मिल जाती है ?

नहीं मेरे सारे सवाल व्यर्थ के हैं।

इस बीच मुझे एक नाम मिला है।.. कज़ान..। ये नाम मैंने तुम्हारा रखा है। मैंने अपने उपन्यास के लीडिंग फीमेल कैरेक्टर का नाम कज़ान रख दिया है। मेरे एक दोस्त ने इस नाम को डायरी में लिखा देखा... उसने कहा... बहुत प्यारा नाम है। मैंने कहा...ये उसका नाम है। फिर वो कई सवाल करने लगा, पर मैंने उसकी सवालों का कोई जवाब नहीं दिया।

क्या तुम्हें पता चला, कि मैंने तुम्हारा नाम कज़ान रखा है ?

अभी मोबाइल पर एक मैसेज आया। मैंने फौरन उठाकर देखा...लगा, कहीं तुम मेरी बात सुन तो नहीं रही। और कहीं तुमने मुझे कोई संदेश तो नहीं भेजा है। किसी कंपनी का कोई मैसेज था। मैंने वापस मोबाइल रख दिया है।

मैं अभी कुछ लिख नहीं पा रहा हूं। अभी मुझे शराब की जरूरत महसूस हो रही है। सारे शब्द गर्दन के पास कहीं फंसे से हैं। इस समय उंगलियों से बेचैनी टपक जाना चाहिए था, पर ऐसा कुछ नहीं हो पा रहा है। कहीं ये तुम्हारा कोई शाप नहीं ? 

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