इस रात...इस जादुई सड़क पर चलते हुए
मन में उठती है एक जंगली कामना
कि बस तुम्हें छूने से अगर मैं पिघल पाता
तो हवा बनकर तुमसे लिपट जाता मैं।
मन में उठती है एक जंगली कामना
कि बस तुम्हें छूने से अगर मैं पिघल पाता
तो हवा बनकर तुमसे लिपट जाता मैं।
रात के तीन बजे हैं। मैं कुर्सी पर बैठा...कंप्यूटर को टुकुर-टुकुर देख रहा हूं। इस वक्त करने के लिए कुछ नहीं है मेरे पास। कुछ लिखने के लिए भी नहीं। वही थके संवाद...वही बुझे शब्द...वही कही सुनी बातें...वही सुनी सुनाई कहानी। पर मेरे पास इस वक्त तुम्हारे लिए कुछ है...।
क्या है, वो मैं तुम्हें नहीं बताऊंगा। तुम चाहो तो मुझे कोस सकती हो...लेकिन, नहीं...मैं नहीं बताऊंगा। दिन में मैंने 2200 रुपये और एटीएम कार्ड खो दिया। फिर 5 किलोमीटर तक पैदल चलता रहा, क्योंकि, जेब खाली हो चुका था। लेकिन क्या तुम यकीन करोगी...कि दोपहर के वक्त भी मुझे गर्मी नहीं लग रही थी। हालांकि, मैं पसीने से भींगा हुआ था...और चेहरा तो अब मेरा काला हो ही चुका है...पर मुझे गर्मी नहीं लग रही थी। मैं खुद हैरान हो गया था घर आने के बाद.... कि ऐसा कैसे हो गया मेरे साथ..। तुम्हारा ख्याल मुझे जकड़े रहा। पैर अपने आप तेज चल रहे थे। एक धुन की तरह मैं बस आगे बढ़ा जा रहा था... बढ़ा जा रहा था...। बस...कार...ऑटो... सब मेरे अगल बगल से गुजर रहे थे, मगर मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था। बस पैरों के पास नजर थी..और मन में तुम्हारा नाम। घर तक आ गया मैं। फिर बिस्तर पर 2 घंटे तक लेटा रहा। थोड़ा बुखार हो गया था शायद..। मैं निढ़ाल लेटा हुआ था...आंखे बंद...और सामने तुम्हारा चेहरा...। जब तुम अपना जीभ थोड़ा सा बाहर निकालता थी...और मैं तुम्हारा नकल करते हुए अपना जीभ थोड़ा बाहर निकाल लिया करता था।
मेरी जान....
इसलिए मेरी चाहत का रंग सलेटी है
कि तुम्हें देखूं....
और तुम्हें छूकर पता नहीं ढल जाऊं किस रंग में ...।
इसलिए तुम कहीं मत जाओ...
खैर...मैं बिल्कुल ठीक हूं....। कोई सागर था...सूख गया। कुछ पत्थर बचे हैं...रेत बची है...मैं बचा हूं...ये रात बची है...तुम बची हो... और ये जादुई सड़क बचा है।
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