Sunday, 20 May 2018

देर रात...

कोई सपना देख लूं...कोई गीत गुनगुना लूं...तुम्हें अपना बना लूं...। जैसे विचारों के बहुत से हाथी... खरगोश... और कबूतर मेरे विचारों में आ रहे हैं...और मुझे लग रहा है, कि मैं एक डंडे से...उन विचारों को हांक कर... कहीं किसी जंगल में छोड़ दूं। पर मैं खुद को बेबस पाता हूं।... बहुत बेबस..। झूठ बोलते हुए । अगर कोई मुझसे इसकी वजह पूछे...तो मैं हंसकर झूठ बोल दूंगा...। और मैं ऐसा ही करता हूं। झूठ बोल देता हूं। मुझे लगता है, कि इन दिनों झूठ मेरा सबसे अच्छा दोस्त हो गया है। हर सवाल पर मैं झूठ को आगे कर देता हूं। झूठ के पर्दे के पीछे खुद को छुपा लेता हूं। सच... कांटे की तरह चुभने लगता है, तो मैं अपने पैर आगे बढ़ा देता हूं।

किन हालातों से मैं गुजर रहा हूं.. ? खुद को किस तरफ ले जा रहा हूं मैं, जबकि मैं ये जानता हूं, कि उस तरफ हाथी, खरगोश और कबूतर नहीं रहते...उधर कुछ बाघ रहते हैं, जो मुझे घायल कर देंगे, या हो सकता है, मुझे मार ही दें, पर मैं भागा जा रहा हूं, बगैर किसी को दोष दिए।


असल में मैंने बहुत दुःखी किया है तुम्हें। तुमने खुद को मेरा अंग माना, एक हिस्सा माना...और मैंने......

बस, देर रात की इतनी ही बात है।

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