Wednesday, 23 May 2018

देखो कज़ान ! चमत्कार हुआ है....

देखो कज़ान ! आज चमत्कार हुआ है....। सुबह हो गई है। एक बार फिर से। और मैंने इसे चमत्कार का नाम दिया है। असल में सुबह हर रोज होती है, इस लिए हम इसे चमत्कार मानना भूल जाते हैं। लेकिन ये एक किस्म का चमत्कार ही है।
अभी मुझे हल्का सा गुस्सा आ रहा है। और मेरा गुस्सा वैसा ही है, जैसे मैंने एक बार शेर को देखने के बाद गुस्सा किया था। शेर पिंजरे में बंद था, और मैं ठीक उसके सामने खड़ा था। पर वो मुझे ऐसे देख रहा था, जैसे मैं उसके सामने नहीं हूं। मैं एक पारदर्शी आदमी हूं। मैं गुस्से में भर उठा। शेर मुझे यूं दरकिनार कैसे कर सकता है ? मैं उस शेर के सामने जोर-जोर से चिल्लाने लगा। अजीब-अजीब हरकतें करना लगा, पर उसपर कोई फर्क नहीं पड़ा। बाद में मेरे दोस्त ने मुझे बताया, कि उस वक्त बिल्कुल मैं बंदरों जैसी हरकतें कर रहा था।

इस वक्त भी मैं वैसे ही गुस्से में हूं। घर में कोई नहीं है, और मैं निर्वात में चीख रहा हूं...चिल्ला रहा हूं, पर घर की दीवारों को...कंप्यूटर को...बिस्तर पर पड़ी सलवटों को...किचन में रखे गैस सिलेंडर को....कोई फर्क ही नहीं पड़ा रहा।

चिढ़....आईना देख रहा हूं।
कोफ्त....ऐसा मैं क्यों कर रहा हूं।
गुस्सा...लोग उधार ले लेते हैं, वक्त पर लौटाते नहीं
हंसी... अभी मार्केट गया था प्रिमिक्स कॉफी लाने। दुकानदार एक लंबे से फ्रीज पर लेटा हुआ था, और उसका एक दोस्त गल्ले पर बैठा था। मैंने उसे कॉफी के पैसे दिए । वह कॉफी के कई डिब्बों से मेरा कॉफी खोजने लगा। वो हर डिब्बा उठा रहा था, सिवाई उसके जो मैंने ऑर्डर किया था। मैं उसे इशारे से दिखा रहा था, कि वो डिब्बा लाओ, पर वो दाएं-बाएं...ऊपर नीचे उलझा हुआ था। मुझे जोर से हंसी आने लगी। फिर खुद दुकानदार उसे गालियां बकता हुआ उठा, और मुझे कॉफी का डिब्बा दिया।

मेरे चेहरे पर अभी भी मुस्कुराहट है। कुछ ही पल में कितना हम बदल जाते हैं। मुझे लगा, इसे लिख लेना चाहिए। कभी खाली दोपहर में फिर से इसे पढ़ लेंगे...कुछ देर मुस्कुरा लेंगे..। असल में ये चमत्कार ही है... ठीक वैसा ही चमत्कार...कि हम सांस लेते हैं।










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