बाहर तेज गर्म हवा चल रही है... घर में तीन कबूतर पंखे पर बैठे हुए हैं। साया किसे पसंद नहीं होता, गर्मी के दिनों में। कबूतरों का गर्दन स्थिर है। बिल्कुल शांत। मेरी तरह। ऐसा लग रहा है, ये कबूतर किसी फैसले पर पहुंचना चाहते हैं।
भूत वाले वाकये के बाद घर से हर दोपहर कई फोन आने लगे थे..। मां और पापा...बारी बारी से फोन कर मेरा हाल पूछते रहते थे...। पर आज कोई फोन नहीं आया। फोन बगल में रखा हुआ है। मैं बार-बार फोन देख लेता हूं, कि कहीं साइलेंट मोड पर तो नहीं है।
वक्त सब कुछ बिसार देता है। शायद पापा भी भूल गये होंगे..मां को भी याद नहीं रहा होगा, कि दोपहर के वक्त मैं घर में बिल्कुल अकेला होता हूं। और अपने कमरे में ही होता हूं। तो क्या मैं इस वक्त कह सकता हूं, कि सब ठीक हो जाता है। लोग सब बात भूलने लगते हैं...या फिर वक्त के कंधे पर धरकर शांत हो जाते हैं। ''जो होना होता है, होकर रहता है'' जैसी बातों पर यकीन कर लेते हैं।
कुछ देर पहले कंप्यूटर पर '' मैं जिस दिन भुल दूं, तेरा प्यार दिल से...वो दिन आखिरी हो मेरी ज़िंदगी का'' ये गीत चल रहा था। गीत सुनकर मैं हंसने लगा। .....कहां होता है ऐसा। देखो कज़ान, मैं ज़िंदा हूं। सालों के प्यार की बातों के बात भी ज़िंदा हूं। असल में मैं अब मानने लगा हूं, कि शपथ टाइप कोई बात होती ही नहीं। वादें बस मुंह से निकला हवा है, जो बस सुनाई देता है, उसका कोई आकार नहीं होता है।
थोड़ी सी रात बची होती
थोड़ी सी बात बची होती
थोड़े दिन बचे होते
तुम्हारा साथ बचा होता
कहां कुछ बचता है...सब खत्म ही तो हो जाता है। खत्म होना ही शाश्वत है...अटल है। हम तो बस खत्म के साथ चलते चलते...कहीं...किसी रोज...किसी खाई में गिर जाते हैं...और फिर वहां से कभी निकल नहीं पाते।
भूत वाले वाकये के बाद घर से हर दोपहर कई फोन आने लगे थे..। मां और पापा...बारी बारी से फोन कर मेरा हाल पूछते रहते थे...। पर आज कोई फोन नहीं आया। फोन बगल में रखा हुआ है। मैं बार-बार फोन देख लेता हूं, कि कहीं साइलेंट मोड पर तो नहीं है।
वक्त सब कुछ बिसार देता है। शायद पापा भी भूल गये होंगे..मां को भी याद नहीं रहा होगा, कि दोपहर के वक्त मैं घर में बिल्कुल अकेला होता हूं। और अपने कमरे में ही होता हूं। तो क्या मैं इस वक्त कह सकता हूं, कि सब ठीक हो जाता है। लोग सब बात भूलने लगते हैं...या फिर वक्त के कंधे पर धरकर शांत हो जाते हैं। ''जो होना होता है, होकर रहता है'' जैसी बातों पर यकीन कर लेते हैं।
कुछ देर पहले कंप्यूटर पर '' मैं जिस दिन भुल दूं, तेरा प्यार दिल से...वो दिन आखिरी हो मेरी ज़िंदगी का'' ये गीत चल रहा था। गीत सुनकर मैं हंसने लगा। .....कहां होता है ऐसा। देखो कज़ान, मैं ज़िंदा हूं। सालों के प्यार की बातों के बात भी ज़िंदा हूं। असल में मैं अब मानने लगा हूं, कि शपथ टाइप कोई बात होती ही नहीं। वादें बस मुंह से निकला हवा है, जो बस सुनाई देता है, उसका कोई आकार नहीं होता है।
थोड़ी सी रात बची होती
थोड़ी सी बात बची होती
थोड़े दिन बचे होते
तुम्हारा साथ बचा होता
कहां कुछ बचता है...सब खत्म ही तो हो जाता है। खत्म होना ही शाश्वत है...अटल है। हम तो बस खत्म के साथ चलते चलते...कहीं...किसी रोज...किसी खाई में गिर जाते हैं...और फिर वहां से कभी निकल नहीं पाते।
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