Tuesday, 1 May 2018

बेवफा की डायरी-1

गीत गाता हूं मैं ..गुनगुनाता हूं मैं...मैंने हंसने का वादा किया था कभी...इसलिए अब सदा मुस्कुराता हूं मैं।.... रात के ठीक 12 बज रहे हैं..और मैं ये गाना सुन रहा हूं। अच्छा लग रहा है..। पर जब भी ....मैंने हंसने का वादा किया था कभी...इसलिए अब सदा मुस्कुराता हूं मैं...ये लाइन आ रहा है, मेरा मन चुप हो जाता है। उसने हंसने का वादा किया था...इसलिए मन में एक कचोट सा उठता है...। खुद को कोसने का मन करता है...। दौड़ पड़ने का मन करता है...जैसे दौड़कर कुछ उठा लूं... सब कुछ समेट कर रख दूं कहीं..। फिर शायद इत्मिनान मिले..। पर कहां भागूं...कहां दौड़ूं...। पैर थोड़े आगे बढ़ते हैं..और वहीं रूक जाते हैं...। आप अपनी करनी पर असीम वेदना से गुजरने लगते हैं..।

हम कहते हैं, कि सब ठीक हो जाएगा..। पर कहां हो पाता है सब ठीक। अधूरेपन को पूर्णता की निशानी मान लेते हैं...पर अधूरापन आखिर में मन के सन्नाटे में तब्दील हो जाता है..। मन मेरा मानता है, कि मैं गुनहगार हूं..। कभी हंसता हूं...तो फरेब की एक रेख होठों पर बन जाती है। मन समझ लेता है...पर मन के पास कोई इलाज नहीं है।.... मन फिर से मुझे कोसने लगता है। एक गलत कदम कितना कुछ बदल कर रख देता है। बहुत कुछ खत्म कर देता है...। मैंने भी बहुत कुछ खत्म कर दिया है..। काफी लंबे अर्से से कुछ लिख नहीं पा रहा हूं। वो लिखने वाला कोई और था...जो अब बैरी हो चुका है... । वो मुझे कहता है, तुम एक निकृष्ट इंसान निकले..। अब मैं तुम्हें शब्द नहीं दूंगा। मैं कई बार चाहता हूं, उससे सुलह कर लूं...पर हर बार वो मुंह फेरकर आगे निकल जाता है। मैं अफसोस लिए वहीं खड़ा रह जाता हूं।

कितने महान लोग थे...जिन्होंने मेरी बातों पर विश्वास किया..। कितने महान लोग हैं, जिन्होंने मुझे क्षमा दिया..। और कैसा मैं हू्ं, कि बस क्षमा याचणा ही करता रह गया।... शाप मिले...शाप स्वीकार किया...। मैं किसी भी तरह से भाग जाना चाहता हूं खुद से।... असल में मैं अब खुद को बेहद नापसंद करने लगा हूं।

रात के साढ़े बारह बज रहे हैं। मैं अपनी गलतियां लिख देना चाहता हूं। हाथ के मैल धो देना चाहता हूं। पर कुछ नहीं कर पा रहा हूं। अलग अलग बहाने कर खुद से भाग जाता हूं। आह...मुंह से अब बस यही शब्द निलकते हैं। पश्चाताप की अग्नि में जलना भी आसान नहीं होता है। मैं आजकल पश्चाताप की अग्नि में ही जल रहा हूं।...और शायद ताउम्र जलता रहूंगा।.. साथी तुम सुखी रहना।...

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वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...