मैं कितना खुलकर अपने कमरे से बात कर लेता हूं. दीवार पर चिपकी खामोशियों को हंसाता हूं. बेतरतीब पड़ी किताबों से कहानियां सुनता हूं, सेल्फ पर पड़े आईने में कभी अपना चेहरा देखता हूं, तो कभी आईने को पलटकर कहीं और रख देता हूं. पंखे पर जमा हो चुके धूल को हटाने का प्लान बनाना और अस्त-व्यस्त पड़े कपड़ों को करीने से रखने की प्लानिंग करना भी मेरी दिनचर्या में शामिल है, मगर कर आज तक नहीं पाया. सब वैसा का वैसा ही रहता है, जब तक कोई और ना आकर उसे सलीके से सजा दे...
जिन चीजों को हम निर्जीव समझते हैं, दरअसल वो चीजें कितना ज्यादा जिंदा होती हैं, बस उन्हें टटोलने भर की जरूरत होती है
जिन चीजों को हम निर्जीव समझते हैं, दरअसल वो चीजें कितना ज्यादा जिंदा होती हैं, बस उन्हें टटोलने भर की जरूरत होती है
Waah Bahut khoob kah gye jnaab...
ReplyDeleteबहुत शुक्रिया पूजा....
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