Sunday, 12 February 2017

मैं डब्बे में बंद हूं...

मुझे बंधन पसंद नहीं है. किसी भी तरह का बंधन. चाहे वो रिश्तों का ही बंधन क्यों ना हो. बंधन में मैं घुटने लगता हूं. मुझे कार में बैठना पसंद नहीं है, कार एक डब्बा सरीखी मुझे लगती है... मुझे ऐसा लगता है, कि किसी ने मुझे डिब्बे में बंद कर दिया है. उसमें मुझे घुटन महसूस होने लगती है. मैं मेट्रो का इस्तेमाल करता हूं.
मैं एक दिन सोचने लगा, मेट्रो ट्रेन भी डब्बा जैसा ही है. एक बड़ा सा कई खानों वाला डब्बा. इसमें भी तो मैं कैद ही रहता हूं. इस सोच ने मेरे बाकी सोच को मौन कर दिया. असल में हम कई खानों में, कई डब्बों में कैद रहते हैं... हमें कैद में रहने की आदत हो गई है.. और इस हिसाब से ये धरती भी तो एक डब्बा ही है. मैं पृथ्वी नाम के डिब्बे में कैद हूं. ये ख्याल आते ही मेरा दम घुटने लगा. मैं इस कैद से फौरन मुक्त होने की सोचने लगा.. लेकिन मुक्ति का मार्ग क्या होगा ? पूजा, पाठ, ध्यान, किर्तन...अर्चना.. वगैरह वगैरह.. ओह... मैं इस पृथ्वी रूपी डब्बे से बाहर निकलने के लिए बेताब होने लगा. मैं लड़ने लगा.. पता नहीं किससे.. मैं इधर ऊधर भागने लगा.. काफी देर भागने के बाद भी मुझे कोई छोर नहीं मिल रहा है. किस दिशा में मैं भागूं.. किस तरफ किनारा है. तभी मुझे ख्याल आया, ओह... धरती गोल है, सेब जैसा. मैंने हाथों में एक सेब ले लिया..सेब को बेहद गौर से मैं देखने लगा.. मुझे लगा, कि सेब की डंठल के पास कहीं मैं खड़ा हूं, गहराई में कहीं. मैंने सोचा, पहले गहराई से निकलना होगा, फिर सेब के सतह पर आने के बाद एक जोरदार छलांग लगानी होगी, और मैं धरती की कैद से बाहर हो जाऊंगा... क्षितिज में कहीं... अंतरिक्ष में कहीं... तारों के बीच कहीं ठहरकर पृथ्वी को देखूंगा... हाथ हिलाकर बाय बोलूंगा.. उस पल मैं खुश होऊंगा... बेहद खुश...

1 comment:

  1. मुक्ति और मोक्ष की बातें

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डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...