Sunday, 12 February 2017

जज्बात की बात...

किसी घटना के ठीक बाद जज्बातों का जो तूफान जन्म लेता है, मैं उसे ही असली मानता हूं. बाद में तो हम उस जज्बात तराजू के पलड़े पर तौलना शुरू कर देते हैं. कभी थोड़ा घटाना, कभी बढ़ाना... संतुलित करने की प्रक्रिया सी चल पड़ती है, और इन सबके बीच जज्बात कहीं मौन हो जाता है, सहम जाता है.
मेरी कहानी के दो किरदारों के बीच संवाद चल रहा है, और कागज पर बिखड़े उन संवादों को पढ़कर मेरी धड़़कने बढ़ जाती हैं, मैं रोमांचित हो उठता हूं, थोड़ा मुस्कुराता हूं, संवाद फिर देखता हूं, और आगे बढ़ जाता हूं. 
इन जज्बातों को लिखना जरूरी था, क्योंकि अभी ये असली है, कुछ वक्त बाद इनका मौन होना तय है....

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