Sunday, 26 February 2017

आम का पेड़

मुझे गांव में सुबह होते देखना अच्छा लगता है। गांव में मुझे दरवाजे पर बैठ कर अतीत को सोचना अच्छा लगता है। गांव की सुबह शहरों की तरह कुम्हलाई नहीं होती है। बिना किसी दाग के होती है। साफ...स्वच्छ, धुली हुई। मैं दालान पर बैठा हुआ हूं। सामने गिलहरियां खेल रही हैं। गिलहरियों ने तो आपस में होड़ लगा रखा है, पेड़ पर चढ़ने-उतरने का। कभी एक जीतती है, और मुंह बनाकर दूसरे को चिढ़ाने लगती है और फिर से रेस शुरू। मैं गिलहरियों को पेड़ पर चढ़ते देखता हूं, मुस्कुराता हूं स्थिर नजरों से। कितना शांत है सब कुछ। इतना शांत कि हवा की खामोशियां भी कानों में गुंज रही हैं। ऐसे ही दिन हुआ करते थे, जब मैं दालान से चिपकी सीढ़ियों से कभी तेज...तो कभी धीमें उतरता था, पौधों को पानी देने के लिए। मुझे पेड़ लगाना बेहद पसंद था। मुझे पौधों को बढ़ते हुए देखना अच्छा लगता था। मैं हर दिन पौधों की लंबाई नापता था और उस दिन खुशी से चिल्ला पड़ता था, जब उनकी लंबाई थोड़ी बढ़ जाती थी। मैं पूरे घर में कोहराम मचा देता था। दादाजी को खींचकर ले जाता था पौधे की बढ़ृी लंबाई दिखाने। और जब वो मेरे साथी हामी में सिर हिलाते और मुझे देखकर हंसने लगते तो मैं भी उनके साथ हंसने लगता था। मैं दादाजी से पूछने लगता था, कि हम पौधों जैसे क्यों नहीं बढ़ते हैं। हम अपनी लंबाई को बढ़ते हुए कब देखेंगे? दादाजी मुस्कुराते हुए हर बार अलग-अलग जवाब देते थे, और मै उनके जवाब को सत्य मानकर पूरे गांव का चक्कर लगा आता था।
वो पौधा जिसे मैंने दादाजी के साथ मिलकर लगाया था, वो अब आम का पेड़ बन चुका है। दादाजी जब दुनिया से जा रहे थे तो आखिरी बार उन्हें उसी पेड़ के नीचे रखा गया था। मैं उस वक्त तक गांव से दूर हो चुका था। और जब दादाजी के जाने के बाद गांव आया तो देखा कि दादाजी आम के पेड़ के साये में सोए हुए हैं। कितना बड़ा हो चुका था ये पेड़। एक रिश्ते की ही तो ये कहानी है। मैं, मेरे दादाजी और मेरा आम का पेड़। हमारे साथ पला, हमारे साथ बढ़ा। दादाजी के जाने के बाद मैं अकसर आम के पेड़ को हाथों में कसकर पकड़ लेता था। मुझे लगता था कि मैं दादाजी के सीने से सिमटा हुआ हूं। आम के पेड़ के साथ मेरे संबंध और गहरे हो गये। अब मैं अपनी निजी तकलीफें उसे सुनाने लगा। आम का पेड़ मेरे लिए एक गुप्त कोना बन गया।
धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि इंसानी रिश्ते और पेड़-पौधें आपस में जुड़े होते हैं। हमें खुशी देखकर पेड़ अपने तनों को प्रसन्न होकर हिलाने लगता है। हमें दुखी देखकर तने कुम्हला जाते हैं, स्थिर हो जाते हैं। इस रिश्ते में इंसानी रिश्तों की तरह बेमानी नहीं होता। हम अपने रिश्ते में कितना बेमानी करते हैं। दरअसल, हम नाटक कर रहे होते हैं रिश्तों को निभाने की। हम अलग-अलग किरदारों में खुद को बांट लेते हैं और किरदार अपनी-अपनी भूमिका निभाने लगता है।
कुछ दिनों पहले मैं एक प्रेमी के किरदार में था। एक लड़की मेरी प्रेमिका की भूमिका में थी। हम दोनों अपने-अपने रिश्ते को निभाने का वादा करते थे। कभी-कभी ये वादा, दावा भी बन जाता था। हम दोनों एक दूसरे के साथ खुश होने का अभिनय करने लगे। कई महीनों तक ये अभिनय चलता रहा। मैं अपने किरदार के प्रति समर्पित था। हर सुबह उसे बाइक से उसके दफ्तर छोड़ने जाना और तय वक्त पर उसे वापस घर छो़ड़ना इस नाटक का हिस्सा था। ये सिलसिला महीनों चलता रहा। एक दिन उसने नाटक से अपना हिस्सा खत्म करने की बात कह दी। अब इस नाटक में अकेला मेरा किरदार बचा। मेरे किरदार ने अपनी भूमिका बदल ली। दुखी होने का, सदमें में रहने का अभिनय करने लगा। वो शराब पीने लगा। चंद महीनों में शराब पर लाख रुपये से ज्यादा खर्च करने के बाद मैं अपने किरदार का गला घोंटने में सफल रहा। और वो नाटक पूरी तरह से खत्म हो गई। जब मैं आम के पेड़ से बात कर रहा था, तो मुझे लगा कि शायद पेड़-पौधों के पास एक अलग तरह की आत्मा होती है। इंसानों से बिल्कुल अलग। मैंने आम के पेड़ को अपनी निजी कहानी सुनाई। उसने अपने अंक में मुझे भर लिया। मैं अब राहत महसूस कर रहा था। और आम का पेड़ हवा के झोंकों के साथ लहरा रहा था। 

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