Saturday, 18 February 2017

हसीन दुश्मन...PART-1

पेड़, पत्ती, पहाड़, पत्थर, जो हैं मुझसे काफी दूर
मैं उन्हें छूना चाहता हूं
क्या मेरी इस चाहना का, पेड़, पत्ती, पहाड़, पत्थर
पर कुछ प्रतिक्रिया होगी?

........क्या प्रतिक्रिया हो सकती है ?.....हाथों में कलम लिए हर्ष कागज पर अगली पंक्ती लिखने की उधेड़बुन में था। कि तभी एक मीठी आवाज ने उसकी तन्मयता को भंग कर दिया। Excuse me…क्या 8 बजे जो स्पेशल शो जाने वाला है, वो आप ही बना रहे हैं। तन्मयता टूटने से भन्नाये हर्ष ने अपना चेहरा ऊपर उठाया, तो सामने खड़ी 22 साल की एक खूबसूरत लड़की, उससे फिर पूछ बैठी। क्या 8 बजे का स्पेशल शो आप ही बना रहे हैं? हर्ष ने बस हूं में जवाब दिया। -मुझे शो बारे में आपसे कुछ बात करनी है। लड़की आंखों में चमक भरे बोली। आंखों से ही इशारा करते हुए हर्ष ने कहा, पूछिए ....। मुझे शो के बारे में कुछ बता दीजिए। आज मैं यहां पहला शो एंकर करने वाली हूं। कागज पर अधूरी लिखी कविता को शर्ट की जेब में रखते हुए हर्ष शो के बारे में बातें करने लगा।
ये पहली मुलाकात थी हर्ष और रागिनी की। रागिनी ने आज ही ज्वाइन किया था स्वाभिमान इंडिया न्यूज चैनल। जहां हर्ष एक लंबे वक्त से काम कर रहा था। शो के सिलसिले में अब अकसर दोनों की बातें होने लगीं। वक्त का काम ही तो बीतना है, तो वो बीतता रहा...और इनके बीच की बातें, अब सिर्फ शो तक ही सीमित नहीं रही थी। कभी साथ चाय पीने लगे, तो कभी ऑफिस के छोटे से कैंटीन में बेफिजूल की गप्पें करने लगे। कहते हैं ना, ये दिल.....कोई शैतान बच्चा ही तो है। ये कहां किसी की सुनता है। हर्ष और रागिनी के दिलों के साथ भी यही होने लगा था। सपनों के लड्डू साथ खाने लगे थे ये दोनों दिल। आकर्षण का शहद कब साथ-साथ चखने लगे दोनों, कुछ पता ही नहीं चला। न्यूज रूम में पचासों लोगों की मौजूदगी में आंख भर बात करना भी आ गया था दोनों को। लेकिन, जुबां पर... बस वो बाली बात अब तक नहीं आई थी। हालांकि, अब तक दोनों को एक दूसरे की नजरों की तलब तो लगने लगी थी, लेकिन प्रेम की पहल कौन करे पहले? प्रेम...ये बस एक शब्द भर तो नहीं है। रूमानी अहसास है, आत्मा का संबोधन है। तो कौन बताए, कि हां मैं तुमसे प्रेम करने लगी हूं, या हां, मैं तुमसे प्रेम करने लगा हूं।    
हमारे शहर में एक कहावत है, लड़की भले ही कितनी भी मॉडर्न क्यों ना हो जाए, वो पहला कदम तो नहीं बढ़ाती। दोनों फोन पर घंटों बात करने लगे थे, सैकड़ों मैसेज भेजने लगे थे एक दूसरे को, लेकिन जादू वाले वो तीन शब्द... अभी तक ना तो मैसेज में में समा पाए थे, और ना ही जुबान पर चढ़ सके थे। हालांकि, हर्ष को अब रागिनी से जुड़ी एक-एक चीज प्यारी लगने लगी थी। उसके रिश्तेदार, उसका पसंदीदा चॉकलेट, उसके सूट का रंग, यहां तक की जिस हॉस्टल में वो रहती थी, उस हॉस्टल के गेट पर भौंकने वाला कुत्ता भी प्यारा हो चुका था हर्ष को।
नजरें जब हद से ज्यादा बेकरार होने लगीं, तो हर्ष ने अपने दिल की उलझन, साथ ही काम करने वाले संदीप को बताई । संदीप ने पूरा माजरा सुना, और हर्ष के उलझन को सुलझाने के अंदाज में बोला, तुम उसे मैसेज में क्यों नहीं बोल देते, कि रागिनी मैं तुम्हें चाहने लगा हूं। हर्ष को ये सलाह पसंद आई। ऐसा नहीं था, कि हर्ष को ये ख्याल नहीं आया था, मगर हिम्मत ने अब तक साथ नहीं दिया था। हर्ष ने ऑफिस के बाहर सिगरेट पीते हुए सोचा, आज की रात भले कुछ भी हो जाए, वो रागिनी से अपने दिल की बात बताकर ही रहेगा।

रात के 11 बज चुके थे। हर्ष ने काफी हिम्मत करते हुए हाथों से मोबाइल उठाया। और पहला मैसेज किया, रागिनी, मैं ये दोस्ती-वोस्ती नहीं रखना चाहता। उधर से रागिनी का मैसेज आया, क्यों, ऐसा क्या हो गया। मेरे किस बात से तुम नाराज हो गये। हर्ष ने रिप्लाई किया, नाराज और तुमसे? ये बात तो मैं सोच भी नहीं सकता। तो, फिर दोस्ती क्यों नहीं रखना चाहते? रागिनी का मैसेज था ये। देखो, मैं सीधे बात पर आता हूं, एक्च्वली, मैं तुम्हें चाहने लगा हूं। मैं तुमसे प्यार करने लगा हूं। आई लव यू। हर्ष ने धड़कते दिलों से मैसेज सेंड कर दिया। कुछ देर तक माहौल में स्तब्धता छाई रही। रागिनी का रिप्लाई नहीं आया। 10 मिनट बीत गये। 20 मिनट बीत गये। आधा घंटा, एक घंटा, 3 घंटे हो गये। रागिनी का कोई मैसेज नहीं आया। हर्ष कभी मोबाइल हाथ में उठाता, तो कभी पलंग के किसी कोने में वापस मोबाइल रख देता। रात के तीन बजे मोबाइल की घंटी बज उठी। रागिनी का फोन था। हर्ष ने बहुत धीमी आवाज में कहा, हलो...। उधर से रागिनी की आवाज आई, हलो...। 

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