कहने को तो रागिनी ने बस हलो कहा था, लेकन हर्ष के लिए आज ये आवाज,
बिल्कुल नई लग रही थी। रागिनी ने फिर कहा...हलो, .....हर्ष । रागिनी की आवाज में
अचानक ये अधिकार कहां से आ गया? हर्ष के दिल में
अच्छा, बुरा, डर, संभावना...नामालुम कितने की खयाल एक साथ उमड़ने लगे थे। और तमाम
खयालों को समेटकर वो मुंह से फिर इतना ही बोल पाया, हलो, रागिनी ।
क्या हम अब दोस्त नहीं रह सकते ? तुम्हें पता है,
तुमसे पहले भी मुझे कई लड़के अलग-अलग तरीकों से प्रपोज कर चुके हैं। और मैंने ना
कहने में, एक पल का भी वक्त नहीं लगाया। हलो, तुम सुन रहे हो ना? हां-हां, मैं सुन रहा हूं, थोड़ा डरते, थोड़ा
संभलते हुए हर्ष ने कहा। अच्छा, तुमने जो मैसेज में कहा, वो अब बोलो। मैं तुम्हारे
मुंह से सुनना चाहती हूं।
ये लड़कियां भी ना, बहुत शैतान होती। मैं तो कहता हूं, शैतान भी इनके
आगे पानी मांग ले। हर चीज ये मुंह से ही क्यों सुनना चाहती हैं, कुछ महसूस क्यों
नहीं करती। बदमाशी करने पर तो मानो इनका जन्मसिद्ध अधिकार ही होता है।
अरे बोलो ना, जो तुम कहना चाह रहे थे। रागिनी की आवाज इस बार जरा तल्ख
थी। अब हर्ष ने तय कर लिया, अरे बोल देता हूं, प्यार ही तो किया है, कोई दुश्मनी
करने का न्यौता थोड़े ही दे रहा हूं। हर्ष ने कहा, रागिनी, आई लव यू। मैं तुम्हें
चाहने लगा हूं। ये बात..ये बात मैं कई दिनों से कहना चाहता था, लेकिन...
लेकिन क्या...जब कहना चाह रहे थे, तो कहे क्यों नहीं? बुद्धू, अगर पहले बोलते, तो मैं पहले ही बोल
देती, आई लव यू टू।
आई लव यू टू। रागिनी के इतना कहते ही, आकाश के मुंह से आह की आवाज
निकली। उसके दिल में जितने भी खयालात थे, मुंह से निकले हवा के साथ उसने सबों को
दिल से बेदखल कर दिया। पहले प्यार की पहला दस्तक संभाले नहीं संभाल पा रहा था
हर्ष। अजब रीत है प्यार की भी, जब दोनों के दिल की बात मिल गई, तो लाख बातें होते
हुए भी दोनों कुछ बोल नहीं पा रहे थे। वो रात बीत गई। और वक्त के साथ दिन भी बीतने
लगे। दफ्तर में जब भी रागिनी किसी खास शो के लिए साड़ी पहनती, या कोई सूट पहनती,
तो वो चाहती, कि सबसे पहले उसे हर्ष ही देखे। हर्ष को मैसेज करती, मेकअप रूम आओ,
कुछ दिखाना है। वो मेकअप रूम के शीशे में नहीं, बल्कि हर्ष की आंखों में खुद की
सुंदरता निहारती थी। दोनों बेहद करीब आने लगे थे। आधुनिक प्रेमियों की तरह ही
घंटों फोन पर चिपके रहना, इनका भी शगल बन गया था। हर छोटी बड़ी बात पर लड़कर ये भी
प्यार के दूसरे पैमानों की रस्मअदायगी करते थे। महानगरों का प्यार छोटे कस्बों के
प्यार जैसा नहीं होता। छोटे कस्बों में मन का मिलन तो जल्दी हो सकता है, मगर तन का
मिलन शायद ही संभव हो पाता है। मेट्रो सिटीज में बंदिशें ना के बराबर होती हैं। और
इसे खामी कहें, या प्यार की एक और मंजिल, हर्ष और रागिनी के बीच भी बंदिशें ना रहीं।
वो जो लड़का और लड़की के बीच दीवार होती है, वो टूट चुकी थी।
हर्ष अपने रिश्ते को लेकर काफी सीरियस हो चुका था। रागिनी भी सीरियस
ही दिखती थी। अभी 6 महीने भी नहीं बीते थे, कि इनके प्यार के चर्चे आफिस के गार्ड
तक को मालूम पड़ चुका था। और वो जो इश्क और मुश्क वाला मुहावरा होता है ना, उसके
एक और उदाहरण ये दोनों बन चुके थे।
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