Sunday, 5 February 2017

कायर

थोड़ी देर उसका नाम लेने के बाद वो मेरे सपने में चली आई। मैं एक पार्क के एक बेंच पर बैठा था। वो हंसकर मेरे बगल में बैठ गई। मैं उसके हाथों को छूना चाहता था, लेकिन उसने हाथ पीछे खींच लिए। मैं उसके हाथों को देखने लगा और वो मुझे। उसने मेरे हाथों को पकड़ लिया...मेरे होठों पर मुस्कुराहट की एक रेखा खिंच गई। वो भी मुस्कुराई। कुछ देर सोचती रही और फिर बोल पड़ी, तुम बहुत बड़े कायर हो। मैंने उससे पूछा- क्यों? तो वो बोली- क्योंकि तुममे हिम्मत नहीं है। 
वो मुस्कुराकर महत्वपूर्ण बातें कहने लगी। मैं गर्दन झुकाए जमीन पर देखने लगा। जमीन पर घास का बिझौना पड़ा था। गिलहरियां आपस में रेस लगा रही थीं। एक गिलहरी को मुंगफली का दाना भी मिल गया था। वो उसे लेकर पार्क के कोने में उगे पेड़ पर चढ़ गई। गिलहरी मेरे नजरों से ओझल हो चुकी थी। 
क्या तुम मेरी बात सुन रहे हो ? उसने इस बार थोड़े गुस्से में सवाल किया था। मेरी तंद्रा अचानक टूटी। और अकचकाते हुए मैंने उससे कहा...उं हांहां..सुन रहा हूं!
क्या सुने ? मैंने क्या कहा ?
मैं उसे अपने कायर नहीं होने के कई सबूत दे सकता था। लेकिन अब मैं सबूत नहीं देना चाहता था। ये खेल चालाकी का होता है। मैंने अपनी गर्म सांसों को लपेटकर उसके हाथों पर रख दिया। 

मैं अकसर जीवन को सरल समझने की भूल करता हूं। पर वो जीवन के मायने समझती है। मैं उसके साथ बूढ़ा होना चाहता हूं। और ये बात उसे मैं बूढ़ा होने पर बताऊंगा। तब तक मैं उसके साथ कायर बनकर ही रहना चाहता हूं।

मेरी गर्म सांसो ने उसके मन को पिघला दिया था। वो मेरे कंधे पर अपना सर रख चुकी थी। वो ऐसा अकसर करती है। 
मैं सपने से बाहर आ गया था। और बड़ी व्याकुलता से वो मुझे याद आने लगी। मैंने उसे फोन किया। वो मेरी व्याकुलता समझ गई थी। पूछी क्या हुआ? मैंने कुछ बेवजह के सवाल किए। कुछ सवालों पर वो झल्लाई। कुछ पर हंसी। मुझे उसका झल्लाना और उसकी हंसी दोनों पसंद है। मैंने फोन रख दिया। और फिर शून्य में खुद को निहारने लगा। 

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