उसकी काजल लगी आंखों से हंसी के कुछ छोटे छोटे टुकड़े तैरते दिखाई दे रहे थे. वो पास आई. मेरे सिर पर हाथ रखा. मेरा बदन बुखार से जल रहा था. सिर की गर्मी देख वो चौंक गई.
--तुम्हें तो बुखार है
--हां, शरीर में काफी दर्द है. थोड़ी प्यास भी लगी है
--रूको, मैं पानी लाती हूं
वो गर्म पानी लिए मेरे बगल में बैठ गई. मैं पानी पीने लगा. मुझे कुछ राहत मिलने लगी. मैं आंखों के काजल से निकलते हंसी के टुकड़ों को निहारने लगा. मैं अब थोड़ा थोड़ा मुस्कुराने लगा था.
--क्या हम बुढा होने तक साथ रह पाएंगें ?
--मेरी प्यास बुझ गई है, अब थोड़ा बेहतर लग रहा है..
तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया.? ये कहकर वो जाने लगी. हंसी के टुकड़े गायब होने लगे थे. मैं उसका हाथ पकड़कर उसे रोकना चाहता था. लेकिन बुखार ने उठने नहीं दिया.
--सुनो... रूको... मैं.. मैं... कहां जा रही हो..?
--मैं पहाड़ों में जा रही हूं.
--पहाड़ों में...? वहां क्या है.?
--देवदार
--लेकिन पहाड़ों में जंगली जानवर होते हैं. शेर, बाघ....
--देवदार के नीचे बैठती हूं तो लगता है अपने पापा के पास हूं. तुम नहीं समझोगे..
मैं भी तुम्हारें साथ देवदार के साये में बैठना चाहता हूं. हम नीली चाय पीएंगे. पत्तियों से टपकते पानी की बूंदों को हाथों से पकड़ने की कोशिश करेंगे.
वो खुश हो गई. मेरी तरफ हाथ बढ़ाया. हम देवदार के नीचे बैठे थे. सामने पहाड़ों के उस पार पानी बरस रहे थे. गिलहड़ियां फुदक रहीं थीं.
मैंने उससे कहा.. देखो देवदार के उस डाल पर एक घोंसला है. वो चिड़ियां अपने बच्चों को पानी पिला रही है. पता है, पानी और प्यास का रास्ता एक होता है.
जैसे मैं प्यासा तुम पानी....
--तुम्हें तो बुखार है
--हां, शरीर में काफी दर्द है. थोड़ी प्यास भी लगी है
--रूको, मैं पानी लाती हूं
वो गर्म पानी लिए मेरे बगल में बैठ गई. मैं पानी पीने लगा. मुझे कुछ राहत मिलने लगी. मैं आंखों के काजल से निकलते हंसी के टुकड़ों को निहारने लगा. मैं अब थोड़ा थोड़ा मुस्कुराने लगा था.
--क्या हम बुढा होने तक साथ रह पाएंगें ?
--मेरी प्यास बुझ गई है, अब थोड़ा बेहतर लग रहा है..
तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया.? ये कहकर वो जाने लगी. हंसी के टुकड़े गायब होने लगे थे. मैं उसका हाथ पकड़कर उसे रोकना चाहता था. लेकिन बुखार ने उठने नहीं दिया.
--सुनो... रूको... मैं.. मैं... कहां जा रही हो..?
--मैं पहाड़ों में जा रही हूं.
--पहाड़ों में...? वहां क्या है.?
--देवदार
--लेकिन पहाड़ों में जंगली जानवर होते हैं. शेर, बाघ....
--देवदार के नीचे बैठती हूं तो लगता है अपने पापा के पास हूं. तुम नहीं समझोगे..
मैं भी तुम्हारें साथ देवदार के साये में बैठना चाहता हूं. हम नीली चाय पीएंगे. पत्तियों से टपकते पानी की बूंदों को हाथों से पकड़ने की कोशिश करेंगे.
वो खुश हो गई. मेरी तरफ हाथ बढ़ाया. हम देवदार के नीचे बैठे थे. सामने पहाड़ों के उस पार पानी बरस रहे थे. गिलहड़ियां फुदक रहीं थीं.
मैंने उससे कहा.. देखो देवदार के उस डाल पर एक घोंसला है. वो चिड़ियां अपने बच्चों को पानी पिला रही है. पता है, पानी और प्यास का रास्ता एक होता है.
जैसे मैं प्यासा तुम पानी....
यादों को सहेजना अच्छा होता है....लेकिन यादें बोझ नहीं होनी चाहिए
ReplyDelete