Monday, 6 February 2017

खाली कमरे से बातचीत

मैं कितना खुलकर अपने कमरे से बात कर लेता हूं. दीवार पर चिपकी खामोशियों को हंसाता हूं. बेतरतीब पड़ी किताबों से कहानियां सुनता हूं, सेल्फ पर पड़े आईने में कभी अपना चेहरा देखता हूं, तो कभी आईने को पलटकर कहीं और रख देता हूं. पंखे पर जमा हो चुके धूल को हटाने का प्लान बनाना और अस्त-व्यस्त पड़े कपड़ों को करीने से रखने की प्लानिंग करना भी मेरी दिनचर्या में शामिल है, मगर कर आज तक नहीं पाया. सब वैसा का वैसा ही रहता है, जब तक कोई और ना आकर उसे सलीके से सजा दे...
जिन चीजों को हम निर्जीव समझते हैं, दरअसल वो चीजें कितना ज्यादा जिंदा होती हैं, बस उन्हें टटोलने भर की जरूरत होती है

2 comments:

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...