Wednesday, 16 August 2017

मन बावर्ची

मन बावर्ची सा हो गया है इन दिनों. खयाली पलाव पकाता रहता है. मैं रोकता हूं, तो जायका खराब होने का डर सताने लगता है. कुछ लिखने बैठ जाता हूं. काफी देर कोरे कागज को ताकने के बाद भी कुछ लिख नहीं पाता. प्रेम पर मैं लंबे दृश्य रच सकता हूं, लंबे संवाद लिख सकता हूं, मगर आज प्रेम पर लिखने का जी नहीं किया, सो लिखने का प्लान स्थगित हो गया है.
फिल्में देखना शुरू कर देता हूं, मगर कौन सा फिल्म देखूं ये तय करने में घंटा भर वक्त निकल जाता है. हारकर कंप्यूटर बंद कर देता हूं. अब बस सन्नाटे में देखना ही काम बचा है. पूरी रात गुजरने के बाद बस एक ही लाइन लिख पाया...
'जीवन में परफेक्ट प्लान जैसा कुछ नहीं होता है. हमें चलते चलते एडजस्ट करना पड़ता है'

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