Wednesday, 16 August 2017

अकेलापन

अकेलेपन की स्थिति में मन सबसे बड़ा चुगलखोर होता है. अकेलापन नियती नहीं होता, इंडिया में हम अकेलापन चुनते हैं. बाध्य नहीं होते. हम अकेलापन क्यों चुनने लगे हैं. इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता. हां कुछ जवाब जरूर मिलते हैं, जैसे क्या हम डरपोक होते जा रहे हैं ? क्या परिस्थितियों या जिम्मेदारियों से भागने लगे हैं? या फिर किसी चित्र या शक्ल की खोज के अरण्य में भटक रहे हैं? उस चित्र का रहस्य समझ लें या उस शक्ल को पढ़ लें तो अकेलापन चुनने की जरूरत नहीं होगी. मेरे लिए सारी वजहें सोचने के बाद भी हर वजह कम पड़ जाती हैं.
रात के 2 बजे रहे हैं. मैं कैब बुक कर घर से निकल गया. खिड़की से दिल्ली के रास्तों को भागते देख रहा हूं. एक जगह मैंने ड्राइवर को रूकने के लिए कहा. देखा, कि एक लड़की एक रिक्शे वाले से तेज आवाज में बातें कर रही है. मैं कार से नीचे उतर गया. ड्राइवर बोला, सर...वो दूसरे टाइप की लड़की है. तभी लड़की की नजर मेरी आंखों से टकरा गई. वो झेंप गई. उसकी आंखों में शर्म दिखने लगा था. शायद वो नई थी. और संभवत: पैसों को लेकर अपने ग्राहक से बहस कर रही थी. मुझे देखते ही उसका स्वर कमजोर होने लगा. फिर वो बहस छोड़ वहां से चली गई. नजर मिलने की वजह से मुझे गिल्ट फील होने लगा. मैं उस लड़की से सॉरी कहना चाहता था. पर ड्राइवर ने कहा- सर, यहां से चलिए. मैं वापिस कार में था. हम अभी इंडिया गेट के आस पास कहीं थे. कुछ देर बाद मैं कनॉट प्लेस में घूम रहा था. दिल्ली की रातें तनहा होतीं हैं. कुछ पुलिसवालों के अलावा रास्ते अमूमन खाली ही रहते हैं. अभी रात के 3 बज चुके हैं और मैं आईसक्रीम खा रहा हूं. रबड़ी आईसक्रीम का टेस्ट मुझे सबसे ज्यादा पसंद है.
आज की रात अकेलेपन को मैंने संपूर्णता के साथ जीया है. अब मैं वापस घर लौट रहा हूं.

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