इन दिनों मौसम कुछ ऐसा है कि अल-सुबह तक नींद नहीं आती. आंखों के अरण्य में झितिज तक खामोशी फैली रहती है. मैं करवटें ले-लेकर नींद की देवी को झांसा देने की कोशिश हर रात करता हूं, लेकिन मेरी बेईमानी पकड़ी जाती है.
इन दिनों आइंस्टीन को पढ़ रहा हूं. आइंस्टीन को पढ़ना कौतूहल को और बढ़ाना है. हर नये पेज पर एक नये चमत्कार को बनता देखता हूं और नाउम्मीदी हर पृष्ट पर दम तोड़ती नजर आती है. कुछ देर उन्हें पढ़ने के बाद मैं जादू की दुनिया में चला जाता हूं. किताब को बस देखता रहता हूं, आइंस्टीन आंखों के सामने होते हैं. मैं उनसे कुछ सवाल करना चाहता हूं, उनसे बातें करना चाहता हूं, पर वो मेरे सवालों का जवाब नहीं देते. बस मुझे देखकर मुस्कुराते रहते हैं. मैं भी उन्हें देखकर मुस्कुराने का अभिनय करता हूं. देखने और मुस्कुराने की इस प्रक्रिया के बीच फिर से सुबह होने को है. कल मैं उन्हें किसी तरह से बात करने के लिए राजी कर लूंगा, ऐसा विचार कर मैंने किताब को बंद कर सिरहाने में रख दिया है. अब कल रात आइंस्टीन से क्या संवाद होंगे इसे लेकर बेहद उत्सुक हूं....
इन दिनों आइंस्टीन को पढ़ रहा हूं. आइंस्टीन को पढ़ना कौतूहल को और बढ़ाना है. हर नये पेज पर एक नये चमत्कार को बनता देखता हूं और नाउम्मीदी हर पृष्ट पर दम तोड़ती नजर आती है. कुछ देर उन्हें पढ़ने के बाद मैं जादू की दुनिया में चला जाता हूं. किताब को बस देखता रहता हूं, आइंस्टीन आंखों के सामने होते हैं. मैं उनसे कुछ सवाल करना चाहता हूं, उनसे बातें करना चाहता हूं, पर वो मेरे सवालों का जवाब नहीं देते. बस मुझे देखकर मुस्कुराते रहते हैं. मैं भी उन्हें देखकर मुस्कुराने का अभिनय करता हूं. देखने और मुस्कुराने की इस प्रक्रिया के बीच फिर से सुबह होने को है. कल मैं उन्हें किसी तरह से बात करने के लिए राजी कर लूंगा, ऐसा विचार कर मैंने किताब को बंद कर सिरहाने में रख दिया है. अब कल रात आइंस्टीन से क्या संवाद होंगे इसे लेकर बेहद उत्सुक हूं....
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