Wednesday, 16 August 2017

भष्मासुर

बहुत लंबे अर्से से उपन्यास वहीं पर पड़ा है. कंप्लीट नहीं कर पाने की गिल्ट हमेशा मेरे चेहरे पर चिपका रहता है. 100 पेज के करीब लिख देने के बाद उसे फाड़ कर फेंक देने की हिम्मत मैं कर चुका हूं. जबकि शो बनाते वक्त अपना लिखा एक लाइन भी डिलिट करना मेरे लिए बहुत भारी होता है. ना जाने कितने ही शो के लिए मुझे डांट पड़ चुकी है, कि इतने ड्यूरेशन का शो क्यों बनाए हो. तो फिर मैंने सौ पेज कैसे रद्दी में फेंक डाला, अब भी सोचता हूं, तो अचरज होता है. फिर सोचता हूं, उपन्यास लिखना शायद किसी किस्म का उन्माद है. और उस उन्माद से मैं अभी दूर हूं.
मेरा मानना है, जो आप सोचते हो, वो असल जिंदगी में भले ही नामुमकिन हो, मगर उसे पर्दे पर जरूर उतारा जा सकता है. जो किताब मैं एक लंबे अर्से से लिख रहा हूं, उसमें बहुत कुछ असंभव बातें हैं. मैंने एक किरदार रचा है, जो मेरे लिए ही भष्मासुर बन बैठा है. उस किरदार को मैं खुद बहुत नापसंद करता हूं, लेकिन उस किरदार के संवाद और उसकी सनक ने मुझे उसे जिंदा रखने को मजबूर कर रखा है. और उपन्यास कंप्लीट ना कर पाने की सबसे बड़ी वजह यही है. सबसे बड़ी दिक्कत है क्लाइमेक्स. मैंने उस किरदार को इतना मजबूत बना दिया है, उसके हाथों में इतनी शक्ति दे दी है, कि मैं खुद उसका विनाश नहीं कर पा रहा हूं.
इस भष्मासुर के लिए मुझे एक विष्णु की तलाश है...

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