रात के 11 बज रहे थे. मैं और श्वेता जी कैंटीन में खाना खा रहे थे. तभी ज़ी हिंदुस्तान के पॉलिटिकल एडिटर असित कुणाल सर वहां आ गये. बातें होने लगी. श्वेता जी ने उनसे कहा - सर, आपका बेटा बहुत क्यूट है. एकदम नटखट प्यारा सा. सर ने कहा-- अरे वो इतना बदमाश हो गया है कि क्या बताएं. सिर्फ 10 महीने का है वो मगर इतनी शैतानियां करता है, कि हम परेशान हो जाते हैं. इतना छोटा होकर भी तरह तरह के मुंह बनाता है. सर ने अपने 10 महीने के बेटे अचिंत्य की कुछ तस्वीरें हमें दिखाई. वो सच में अलग अलग अंदाज में मुंह बना रहा था. मैंने कहा- सर, वो आगे जाकर जरूर क्रिएटिव होगा. सर ने कहा- हर संडे मैं उसे शॉवर में नहलाता हूं. और अब किसी की मजाल है कि सनडे को उसे कोई और नहला दे. वो मेरे साथ ही कंधे पर बैठकर नहाएगा.
सर से बात करते करते मुझे बचपन की मेरी कहानी याद आ गई. मुझे देर रात जगने की आदत बचपन से ही थी. पापा कभी किस्सा सुनाते हुए कहते हैं, कि मुझे आईने में खुद को देखना बहुत अच्छा लगता था. ((अभी भी लगता है)) पापा मुझे घंटों तक आईने के सामने गोद में लिए खड़े रहते थे. मैं आईने में खुद को देखते जाता और बिलग बिलग की आवाज निकालता रहता था. पता नहीं मैं उस वक्त क्या सोचता होऊंगा. लेकिन अभी मुझे लगता है, कि एक पिता अपने बच्चों की शैतानियां किस किस तरह से नहीं सहता. वो धैर्य के साथ घंटों आईने के सामने मुझे लिए खड़े रहते थे. और मैं मुंह में हाथ लिए वो एक खास तरह की आवाज निकालते रहता था.अब मैं सोचता हूं, मेरे जैसे आलसी इंसान के लिए ऐसा करना नामुमकिन के बराबर है.
रौशन और मैं किसी काम से मेट्रो से कहीं जा रहे थे. और उस वक्त रौशन को मैंने अपने बचपन की ये कहानी बताई. उसने मुझसे पूछा, अगर तुम्हारा बेटा भी ऐसा करे तो ? हालांकि अभी तक मैं इन तमाम झंझटों से काफी दूर हूं, मगर फिर भी मैंने कहा- मैं पूरे घर में शीशा लगवा दूंगा. फ्लोर भी शीशा का ही रहेगा. ताकि उसे मुझे घंटों गोदी में लिए खड़ा ना रहना पड़े. ये तो खैर मजाक में मैंने कह दिया था. लेकिन मुंबई की वो महिला मुझे याद आ गई, जो घर में कंकाल बनकर रह गई, लेकिन उसका बेटा अमेरिका से नहीं आया. जब आया तो उसकी मां की मौत के कई महीने बीत चुके थे और उनकी हड्डियों का ढांचा घर में पड़ा था. अपने बेटे से प्यार करने की ये सजा उस महिला ने पाई थी. मुझे लगता है, हमारा देश वाकई बदल रहा है. यहां मानवीय संवेदनाएं वाकई खत्म होती जा रही हैं. रिश्ते और रिश्तों की गर्माहट सिर्फ ढांचा बनकर रह गई है जहां एक मां बाप अपने बच्चों की शैतानियां सहता रहता है वहां बदले में बेटा उसे हड्डियों का ढांचा बना देता है.
सर से बात करते करते मुझे बचपन की मेरी कहानी याद आ गई. मुझे देर रात जगने की आदत बचपन से ही थी. पापा कभी किस्सा सुनाते हुए कहते हैं, कि मुझे आईने में खुद को देखना बहुत अच्छा लगता था. ((अभी भी लगता है)) पापा मुझे घंटों तक आईने के सामने गोद में लिए खड़े रहते थे. मैं आईने में खुद को देखते जाता और बिलग बिलग की आवाज निकालता रहता था. पता नहीं मैं उस वक्त क्या सोचता होऊंगा. लेकिन अभी मुझे लगता है, कि एक पिता अपने बच्चों की शैतानियां किस किस तरह से नहीं सहता. वो धैर्य के साथ घंटों आईने के सामने मुझे लिए खड़े रहते थे. और मैं मुंह में हाथ लिए वो एक खास तरह की आवाज निकालते रहता था.अब मैं सोचता हूं, मेरे जैसे आलसी इंसान के लिए ऐसा करना नामुमकिन के बराबर है.
रौशन और मैं किसी काम से मेट्रो से कहीं जा रहे थे. और उस वक्त रौशन को मैंने अपने बचपन की ये कहानी बताई. उसने मुझसे पूछा, अगर तुम्हारा बेटा भी ऐसा करे तो ? हालांकि अभी तक मैं इन तमाम झंझटों से काफी दूर हूं, मगर फिर भी मैंने कहा- मैं पूरे घर में शीशा लगवा दूंगा. फ्लोर भी शीशा का ही रहेगा. ताकि उसे मुझे घंटों गोदी में लिए खड़ा ना रहना पड़े. ये तो खैर मजाक में मैंने कह दिया था. लेकिन मुंबई की वो महिला मुझे याद आ गई, जो घर में कंकाल बनकर रह गई, लेकिन उसका बेटा अमेरिका से नहीं आया. जब आया तो उसकी मां की मौत के कई महीने बीत चुके थे और उनकी हड्डियों का ढांचा घर में पड़ा था. अपने बेटे से प्यार करने की ये सजा उस महिला ने पाई थी. मुझे लगता है, हमारा देश वाकई बदल रहा है. यहां मानवीय संवेदनाएं वाकई खत्म होती जा रही हैं. रिश्ते और रिश्तों की गर्माहट सिर्फ ढांचा बनकर रह गई है जहां एक मां बाप अपने बच्चों की शैतानियां सहता रहता है वहां बदले में बेटा उसे हड्डियों का ढांचा बना देता है.
No comments:
Post a Comment