दफ्तर से देर रात आने के बाद दिल बड़ी देर तक किंकर्तब्यविमूढ़ की स्थिति में रहता है. इस वक्त कोई काम नहीं होता है. घर पहुंचते ही मैं अपने कमरे में लेट जाता हूं. कुछ देर आंखें बंद रहती है. मगर अंदर कोई ख्याल नहीं रहता. दिन भर चलायमान होने के बाद अचानक रूक जाना भी बेहद अजीब होता है. फिर मैं आहिस्ता आहिस्ता आंखे खोलता हूं, और कमरे को निहारने लगता हूं. जैसा इसे छोड़कर गया था, ये वैसा ही है ना, उसे मुआयना करने की कोशिश करने लगता हूं. कमरे के कोनों में पसरी खामोशियों में एक आवाज खोजने की कोशिश करता हूं. जब बड़ी देर तक कोई आवाज नहीं आती, तो फ्रिज देखने लगता हूं. फ्रिज खोलकर अंदर से सुख निकालने की कोशिश करता हूं, मगर दो घूंट पानी पीकर वापस बिस्तर पर आ जाता हूं.
इन तमाम प्रक्रियाओं के दरम्यां ना कोई उम्मीद होती है, ना सपना.. ना दर्द, ना चैन... ना स्मृति ना कोई खोज. इस वक्त छत पर मकड़ी के जाले को देखता मैं कौन होता हूं, पता ही नहीं चलता.
ना उमंग, ना उत्साह, ना नींद
पेशानी पर पसरा पसीना
ना सोने की इच्छा, ना जागने की ख्वाहिश
हाथ के नाखून से पैरों के नाखून को साफ करना
ऊंगलियों से दिवाल छूना, सहलाना
इस आधे घंटे में ये सब शामिल होता है
करीब आधे बाद मेरी ही शक्ल का एक आदमी मुझे मेरे सामने खड़ा दिखाई देता है. मैंने उसे 'दया' नाम दिया है. वो इंगलिश हैट पहना हुआ होता है. उसकी ऊंगलियों में सिगरेट सुलग रहा होता है. कोट पैंट और टाय पहना हुआ वो किसी सिक्रेट एजेंट सा दिखता है. दया मुझे बेबस निढ़ाल बिस्तर पर पड़ा देख रहा होता है. मैं उससे नजर मिलाता हूं पर उसकी आंखों में मेरे लिए करूणा दिखती है. करूणा दिखते ही मैं झट से खड़ा हो जाता हूं. मैं भला किसी की आंखों में खुद को बेबस कैसे देख सकता, इसलिए फौरन फ्रेश हो जाता हूं. बेबसी में बेरूखी शामिल होता है, इसलिए मैं खुद को बेबस नहीं देखना चाहता. मेरी शक्ल का आदमी अब गायब हो चुका होता है. इसलिए कॉपी कलम निकालकर मैं कुछ लिखने बैठ जाता हूं.
इन तमाम प्रक्रियाओं के दरम्यां ना कोई उम्मीद होती है, ना सपना.. ना दर्द, ना चैन... ना स्मृति ना कोई खोज. इस वक्त छत पर मकड़ी के जाले को देखता मैं कौन होता हूं, पता ही नहीं चलता.
ना उमंग, ना उत्साह, ना नींद
पेशानी पर पसरा पसीना
ना सोने की इच्छा, ना जागने की ख्वाहिश
हाथ के नाखून से पैरों के नाखून को साफ करना
ऊंगलियों से दिवाल छूना, सहलाना
इस आधे घंटे में ये सब शामिल होता है
करीब आधे बाद मेरी ही शक्ल का एक आदमी मुझे मेरे सामने खड़ा दिखाई देता है. मैंने उसे 'दया' नाम दिया है. वो इंगलिश हैट पहना हुआ होता है. उसकी ऊंगलियों में सिगरेट सुलग रहा होता है. कोट पैंट और टाय पहना हुआ वो किसी सिक्रेट एजेंट सा दिखता है. दया मुझे बेबस निढ़ाल बिस्तर पर पड़ा देख रहा होता है. मैं उससे नजर मिलाता हूं पर उसकी आंखों में मेरे लिए करूणा दिखती है. करूणा दिखते ही मैं झट से खड़ा हो जाता हूं. मैं भला किसी की आंखों में खुद को बेबस कैसे देख सकता, इसलिए फौरन फ्रेश हो जाता हूं. बेबसी में बेरूखी शामिल होता है, इसलिए मैं खुद को बेबस नहीं देखना चाहता. मेरी शक्ल का आदमी अब गायब हो चुका होता है. इसलिए कॉपी कलम निकालकर मैं कुछ लिखने बैठ जाता हूं.
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