कबूतर कहानी नहीं लिखते
कबूतरों की एक अलग कहानी होती है
कोने में बहुत देर से एक कबूतर बैठा हुआ था. मैं उसे निहारे जा रहा था. उसकी अनगढ़ जिंदगी के बारे में सोच रहा था. मैंने गौर किया कि ये कबूतर काफी वक्त से गुटरगूं नहीं कर रहा है. मैं खिड़की खोल कर कमरे के बाहर दीवारों पर बैठे कबूतरों को देखने लगा. वो सब भी बेहद खामोश थे. उनकी खामोशी अब मुझे अखरने लगी थी. चारों तरफ सिर्फ गाड़ियों की कर्कश आवाज, पर नीम खामोशी. मैंने चिल्लाकर कहा... अरे भाई लोग, कुछ बोलते क्यों नहीं? इतने चुप क्यों हो ? हल्ला करो...शोर मचाओ. पर सब शांत रहे. मैंने खिड़की बंद कर दिया. कोने में बैठे कबूतर के सामने कुछ चावल के दाने और एक कटोरा पानी रख दिया. पर उसने खाने को बड़ी ही हिकारत की नजर देखा. मुझे उसका रूखापन अखरने लगा. मैंने कबूतर को अपने हाथों से उठा लिया... उसे हाथों से पुचकारने लगा.
मैंने महसूस किया... कि दिल्ली के कबूतर अब गुटरगूं नहीं करते हैं. आप सिर्फ उनके पंखों की फड़फड़ाने की आवाज ही सुन पाएंगे. गांवों के कबूतर बहुत शोर मचाते हैं, खेलते हैं गंदगी भी बहुत फैलाते हैं. पर दिल्ली के कबूतरों की वेग की धाराएं स्थिर हो गईं हैं. उनकी स्थिरता में शायद एक प्रश्न होता है या फिर उनके खालीपन और मौन को अभी पढ़ा जाना शेष है.
कभी कभी मुझे लगता है कि ये दुखी कबूतर हैं. इन्होंने शायद प्रेम का त्याग कर दिया है. ये बस जिंदा रहते हैं, जिंदगी के होने के मतलब से इनका कोई मतलब नहीं रह गया है. कुछ देर बाद मैंने घर के मुंडेर पर कबूतर को छोड़ दिया. पर आश्चर्य वो उड़ा नहीं. वो वहीं बैठा रहा... बहुत देर तक.
मैं वापस कमरे में था... खिड़की से बाहर देखते हुए... किसी प्रेम से भरे कबूतर के इंतजार में.....
कबूतरों की एक अलग कहानी होती है
कोने में बहुत देर से एक कबूतर बैठा हुआ था. मैं उसे निहारे जा रहा था. उसकी अनगढ़ जिंदगी के बारे में सोच रहा था. मैंने गौर किया कि ये कबूतर काफी वक्त से गुटरगूं नहीं कर रहा है. मैं खिड़की खोल कर कमरे के बाहर दीवारों पर बैठे कबूतरों को देखने लगा. वो सब भी बेहद खामोश थे. उनकी खामोशी अब मुझे अखरने लगी थी. चारों तरफ सिर्फ गाड़ियों की कर्कश आवाज, पर नीम खामोशी. मैंने चिल्लाकर कहा... अरे भाई लोग, कुछ बोलते क्यों नहीं? इतने चुप क्यों हो ? हल्ला करो...शोर मचाओ. पर सब शांत रहे. मैंने खिड़की बंद कर दिया. कोने में बैठे कबूतर के सामने कुछ चावल के दाने और एक कटोरा पानी रख दिया. पर उसने खाने को बड़ी ही हिकारत की नजर देखा. मुझे उसका रूखापन अखरने लगा. मैंने कबूतर को अपने हाथों से उठा लिया... उसे हाथों से पुचकारने लगा.
मैंने महसूस किया... कि दिल्ली के कबूतर अब गुटरगूं नहीं करते हैं. आप सिर्फ उनके पंखों की फड़फड़ाने की आवाज ही सुन पाएंगे. गांवों के कबूतर बहुत शोर मचाते हैं, खेलते हैं गंदगी भी बहुत फैलाते हैं. पर दिल्ली के कबूतरों की वेग की धाराएं स्थिर हो गईं हैं. उनकी स्थिरता में शायद एक प्रश्न होता है या फिर उनके खालीपन और मौन को अभी पढ़ा जाना शेष है.
कभी कभी मुझे लगता है कि ये दुखी कबूतर हैं. इन्होंने शायद प्रेम का त्याग कर दिया है. ये बस जिंदा रहते हैं, जिंदगी के होने के मतलब से इनका कोई मतलब नहीं रह गया है. कुछ देर बाद मैंने घर के मुंडेर पर कबूतर को छोड़ दिया. पर आश्चर्य वो उड़ा नहीं. वो वहीं बैठा रहा... बहुत देर तक.
मैं वापस कमरे में था... खिड़की से बाहर देखते हुए... किसी प्रेम से भरे कबूतर के इंतजार में.....
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