Wednesday, 16 August 2017

राधा और कान्हा

राधा और कान्हा यमुना तट पर बैठे बात कर रहे थे। राधा जाने को थी, लेकिन कान्हा उन्हें रोक रहे थे। और कल फिर से मिलने की जिद कर रहे थे। कान्हा ने कहा... जब मैं मुरली बजाऊं, तो समझ लेना राधा, कि मैं नदी तट पर तुम्हारी राह देख रहा हूं।
राधा- ना ना..मैं हाथ जोड़ती हूं...मुरली ना बजाना
कान्हा ने कहा- क्यों, मुरली क्यों ना बजाऊं ?
राधा- ना जाने तुम्हारी मुरली की सुरों में क्या जादू है। दोपहर के समय मुरली सुनते ही मेरी सखियां जाग जाती हैं। जब मैं तुमसे मिलने आती हूं, तो झरोखों से वो मुझे देखने लगती हैं। फिर सबको पता चल जाता है, कि तुम गांव के बाहर आ गये हो। घर-घर में मेरी और तुम्हारी चर्चा होने लगी है। तू नहीं जानता कान्हा, तेरे लिए मुझे कितनी निंदा सहनी पड़ती है।
राधा के बेबस नयनों को देखते हुए कान्हा कहते हैं- देखो राधा, जो निंदा से डरे, उसे प्रेम की डगर पर नहीं चलना चाहिए। इसलिए, जब मैं मुरली बजाया करूं, तो तुम घर से मत निकला करो।
राधा शिकायत करते हुए कहती हैं- परंतु ये पापिन, मुरली ही तो सारे दुखों की जड़ है. इसे सुनकर आये बिना रहा भी नहीं जाता मुझसे। इस सौतन के सुर तो जैसे पाश में बांधकर ले आते हैं मुझे। इसलिए कहती हूं, मुझपे दया करो
कान्हा- फिर तो प्रेम करना छोड़ दो राधा
राधा- ये भी तो संभव नहीं है
कान्हा- फिर ये भी संभव नहीं, कि मैं आना छोड़ दूं। देखो राधा, मुझे किसी निंदा की डर नहीं। इसलिए, मैं तो आया करूंगा
राधा- अगर मैं नहीं आऊंगी, तो तुम क्या करोगे
कान्हा- तो मैं...तुम्हारे चरणचिन्हों को ही मुरली सुनाकर लौट जाऊंगा
राधा—मेरे चरणचिन्हों को ?
कान्हा- हां...तुम प्रात: सखियों के संग जल भरने नदी तट पर जाती हो ना, तो वहां सबके चरणचिन्ह होते हैं। मैं उनमें से तुम्हारे चरणचिन्हों को पहचान सकता हूं। बस... मैं उन्हीं को प्रेम कर लौट जाऊंगा।
राधा की आंखों से आंसू बहने लगते हैं।
तभी राधा की मां की आवाज यमुना तट पर सुनाई देने लगती हैं। राधा जल्दी से जाने के लिए उठती है। कान्हा कहते हैं- राधा तो तुम आओगी ना?
राधा मुंह बनाकर कहती हैं- हूं, आऊंगी। ऐसा हो सकता है, कि तू मुरली बजाए कान्हा...और मैं ना आऊं।
इस तरह कान्हा ने राधा से फिर मिलने का वचन ले ही लिया। कितने छलिया हैं हमारे कान्हा भी....

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